कन्याकुमारी : सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का समृद्ध संसार, रहस्य और रोमांच से भर देता है तीन सागरों का मिलन
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| विवेकानंद रॉक मेमोरियल |
ऐसे ही न जाने कितने प्रश्न मेरे अंदर से उभरे थे। उनके साथ उत्तर भी आए थे। एक अंतर्द्वंद चल रहा था मेरे भीतर। त्रिवेंद्रम की धरती ने एक आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार किया था। कन्याकुमारी के सफर में यह ऊर्जा मुझसे संवाद कर रही थी। एक बाहर की यात्रा थी और दूसरी थी-अंतर्यात्रा। व्यक्तित्व दो भागों में बंट गया था। आंतरिक जीवन मे यह गुरू और शिष्य का अंतर्मिलन था। साथ में एक अवसर भी-खुद के भीतर झांकने, खुद को समझने और खुद से जुड़ने का। एक अंतर स्वर गूंज रहा था मेरे अस्तित्व में। जैसे कोई कह रहा हो-“ तुम्हारी इच्छाओं के विकल्प ही तुम्हारा भविष्य हैं। तुमने वही पाया है, जो तुमने चाहा है। और, वही पाओगे जिसका तुमने चुनाव किया है। तुम अपनी जिंदगी के वास्तुविद हो। ब्रह्मांड की शाश्वत चेतना में तुम अनंत क्षमताओं से युक्त हो। यहां सब कुछ भरपूर है। तुम्हें चुनने की आजादी है। तुम जैसा चाहो, वैसा जीवन चुन सकते हो।“ मन की लहर ने कहा-“आज तो मैंने कन्याकुमारी की यात्रा को चुना है और मैं सफर कर रहा हूं।“ त्रिवेंद्रम से कन्याकुमारी के बीच लगभग 97 किलोमीटर की यात्रा में प्राकृतिक सौंदर्य तो मनभावन था ही, उससे भी ज्यादा जुनून से सुकून की ओर बढ़ रही अंतर्यात्रा थी।
त्रिवेंद्रम ने मुझे अपनी प्यार भरी बांहों में समेटा था। शांति, सौंदर्य और आत्मबोध का दीपक टिमटिमाया था यहां। प्रकृति के हजार हाथ सहारा दे रहे थे। इसी कारण जुनून भी बरकरार था यात्रा का। भाषा और प्रांत भेद की दीवारें गिर गई थीं। यहां एहसासों की भाषा ने अपना घर बना लिया था। तमिल और मलयालम संस्कृति के प्रति प्रेम और सम्मान मुझमें जाग्रत हो गया था। पद्मनाभस्वामी को मैं कैसे भूल सकता हूं? उनके स्मरण मात्र से मन के मैल धुल रहे थे। मंदिर के वास्तु, परंपरा और आस्था के रूप में शाश्वत सनातन संस्कृति के मैंने दर्शन किए थे। और, सनातन धर्म की त्रिदेव की उस धारणा के भी, जहां भगवान विष्णु सृष्टि के पालन कर्ता हैं। एक कर्मयोगी की साक्षात प्रतिमूर्ति। ताओ फिजिक्स की दृष्टि में वे ब्रह्मांड की अणु में समाई ऊर्जा हैं। इसीलिए, वे विष्णु हैं। मेरे लिए पद्मनाभस्वामी को अपने हृदयस्थल में विराजित करने का एक ही उद्देश्य था-ऊर्जावान होकर जीना। प्रकृति में ऊर्जा का समुच्चय कहीं भी हो, उसमें आकर्षण की शक्ति होती ही है। सुबह के नौ बजे थे। मैं त्रिवेंद्रम रेलवे स्टेशन पर था। कुछ मलयाली बच्चे मेरे आसपास आ गए थे। ये ग्रेजुएशन कर रहे थे। मैं कन्याकुमारी के लिए ट्रेन का इंतजार कर रहा था। थोड़ी सी बातचीत में वे घुल-मिल गए थे। मैंने उनसे कुछ जानकारी चाही थी। उन्होंने मेरे लिए एक गाइड की तरह काम किया। उन्होंने कन्याकुमारी का पूरा एक रोडमैप समझाया था। जब मेरी ट्रेन पहुंची, तब यही बच्चे मुझे मेरे कोच तक छोड़ने आए थे। उनकी आंखों की चमक, श्रद्धा के भाव और मधुरता ने त्रिवेंद्रम की स्मृतियों में एक और अध्याय जोड़ दिया था।
वंदे मातरम् , वंदे मातरम् !
त्रिवेंद्रम से कन्याकुमारी का सफर बड़ा सुहावना था। चारों तरफ हरियाली। नारियल के पेड़ों की श्रृंखला। फूलों के बागान। लहलहाती धान की फसल। सुदूर छोटी-छोटी पहाड़ियां। सुरंगों से गुजरती ट्रेन। केरल से तमिलनाडू में प्रवेश। यह एक नायाब दुनिया थी। दिल में एक खुशी थी-कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत को देख पाने की। कश्मीर की कई बार यात्राएं थीं। अमरनाथ, श्रीनगर, फिरोज लेक, गुलमर्ग-खिलमर्ग, द्रास, कारगिल, पहलगाम, अनंतनाग और बारामूला के साथ अनेक दुर्गम इलाकों के हम साक्षी रहे हैं। कन्याकुमारी की यात्रा मेरे जीवन का पहला अनुभव था। और, एक भावुक क्षण भी-समग्र भारत को एक सूत्र में देख पाने का। मेरा सिर विविधता से भरी अपनी मातृभूमि की वंदना में झुक गया था। मुझे लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार एवं भारत का राष्ट्रगीत लिखने वाले श्री बंकिम चंद्र चटर्जी का स्मरण हो आया था। आह्लाद से भरे मन में आज इस गीत को गाने का जुनून जाग उठा था। यह गीत था-
वंदे मातरम्, वंदे मातरम् !
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
सस्य श्यामलां मातरंम् .
शुभ्र ज्योत्सनाम् पुलकित यामिनीम्
फुल्ल कुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम् .
सुखदां वरदां मातरम् ॥
कोटि कोटि कन्ठ कलकल निनाद कराले
द्विसप्त कोटि भुजैर्ध्रत खरकरवाले
के बोले मा तुमी अबले
बहुबल धारिणीम् नमामि तारिणीम्
रिपुदलवारिणीम् मातरम् ॥
तुमि विद्या तुमि धर्म, तुमि ह्रदि तुमि मर्म
त्वं हि प्राणाः शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमारै प्रतिमा गडि मन्दिरे-मन्दिरे ॥
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदल विहारिणी
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्
नमामि कमलां अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलां मातरम् ॥
श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्
धरणीं भरणीं मातरम् ॥
वंदे मातरम्, वंदे मातरम् !
कन्याकुमारी : “लैंडस आफ एंड”
लगभग दो घंटे के सफर के बाद हम भारत के सबसे दक्षिणी शहर कन्याकुमारी में थे। यह “लैंडस आफ एंड” का भी प्रतीक है। तमिल भाषी शहर होने के बावजूद यहां हिंदी समझने वाले भी थे। यहां ठहरने का इंतजाम शानमुगा रेजीडेंसी में था। शहर से थोड़ा दूर। बिल्कुल एकांत। यहां से थोड़ी दूरी पर था श्रीनगर-कन्याकुमारी हाइवे। समुद्र तट करीब दो किलोमीटर दूर था। और, स्वामी विवेकानंद शिला स्मारक तट से करीब 500 मीटर दूर। कन्याकुमारी की तटीय रेखा करीब 72 किलोमीटर तक फैली हुई है। यहां दो सागरों और एक महासागर का मिलन होता है। ये हैं- हिन्द महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी। सागर की रंग बदलती लहरें त्रिवेणी का एहसास कराती हैं। आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से यह शहर समृद्ध है। यह कभी केरल का हिस्सा का हुआ करता था। इसीलिए, मलयाली साहित्य में यहां का सदियों से उल्लेख होता रहा है। पश्चिमी दुनिया के खोजकर्ताओं ने भी यहां के अपने संस्मरणों का जिक्र किया है। इनमें सबसे अहम हैं-ग्रीक दार्शनिक एवं खगोलविद् क्लॉडियस टॉल्मी और वेनिस के व्यापारी-घुमक्कड़ मार्को पोलो। 1729 से 1758 के बीच राजा मार्तंड वर्मा के शासन में कन्याकुमारी का इलाका त्रावणकोर राज्य का हिस्सा बन गया था, तब इसकी राजधानी पद्मनाभपुरम थी। देश की आजादी के बाद त्रावणकोर राज्य का भारतीय संघ में विलय हो गया। और, 1956 में यह तमिलनाडु का एक जिला बन गया।
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| कन्याकुमारी मंदिर |
अरुलमिगु भगवती अम्मन मंदिर
कुंवारी कन्या यहां की देवी हैं। उन्हीं के नाम से यह शहर बसा है। देवी को समर्पित मंदिर का नाम कन्या कुमारी मंदिर है। यहां के लोग इसे अम्मन मंदिर या अरुलमिगु भगवती अम्मन मंदिर कहते हैं। कन्याकुमारी भ्रमण की यात्रा हमने इसी मंदिर से शुरू की। आध्यात्मिक ऊर्जा से अनुप्राणित इस मंदिर में कदम रखते ही मन सुकून की गंगा में नहा गया था। ठंडी हवा आद्य शक्ति से जुड़ने का एहसास करा रही थीं। मनोरम समुद्र तट और मंदिर पर पड़ती सूरज की किरणें, अद्भुत था यह दृश्य। लग रहा था-मानो प्रकृति मां की आराधना कर रही हो। मां की मूर्ति नयनाभिराम थी। यह मूर्ति काले पत्थर से बनी है। मां नाक में एक भव्य सुनहरा छल्ला पहनें थीं, जो काले रंग के ऊपर खूबसूरती से चमक रहा था। मंदिर में कर्मकांड का काफी महत्व है। सुबह चार बजे से रात 8.30 बजे तक यहां पूजा-प्रार्थना होती रहती है। मंदिर परिसर के मूल में गंगातीर्थम नामक कुआं है जहां से देवी के अभिषेक का जल लाया जाता है। मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व खास मौकों पर ही खुलता है। आमतौर पर श्रद्धालु उत्तर द्वार से मंदिर में प्रवेश करते हैं। भारत के 51 शक्ति पीठ में से कन्याकुमारी को भी माना जाता है। मान्यता है कि यहां पर सती की रीढ़ की हड्डी गिरी थी। एक किंवदंती यह भी है कि देवी ने बाणासुर राक्षस से यहां की रक्षा की थी। यूं तो मंदिर 3000 साल पुराना होने के दावे किए जाते हैं, पर पुरातत्वविदों की दृष्टि से यह आठवीं शताब्दी का मंदिर है। पांड्या सम्राटों ने इसे बनवाया होगा। चोला, चेरी, वेनाड और नायक राजवंशों के शासन में इसका समय-समय पर पुनर्निर्माण होता रहा। मंदिर की वास्तुकला द्रविड़ शैली की है जिसमें काले पत्थर के खम्भों पर गूढ़ और पेचीदा नक्काशी है। मंदिर पर गुंबद है। इन पर गणेश, सूर्य देव, अप्पा स्वामी, काल भैरव विजय सुंदरी और बाल सुंदरी आदि देवी देवताओं की मूर्तियां उकेरी हुई हैं। मंदिर समुद्र तट से कुछ ऊंचाई पर है। इसके चारों ओर लगभग 12 से 20 फुट की दीवार बनी हुई है ।
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| थानुमालयन मंदिर |
थानुमालयन : मंदिर के भीतर मंदिर
कन्याकुमारी मंदिर से हम सुचिन्द्रम पहुंचे थे। यहां भव्य थालुमालयन मंदिर था। यहां के लोग इसे स्थानुमलयन कोविल मंदिर भी कहते हैं। यह तमिल और केरल की वास्तु शैली का एक और बेजोड़ उदाहरण था। मंदिर परिसर करीब दो एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ था। दो प्रवेश द्वार (गोपुरम्) थे। हमने पूर्वी द्वार से मंदिर में प्रवेश किया था। पूर्वी द्वार 11 मंजिल ऊंचा था। करीब 144 फुट ऊपर टॉवर था। मंदिर का अग्रभाग मूर्तियों से ढका हुआ था। प्रवेश के वक्त मंदिर के स्तंभयुक्त गलियारे आश्चर्य से भर देने वाले थे। उन पर देवी-देवताओं की उकेरी गईं मूर्तियां हैरान कर देने वाली थीं। मंदिर के लंबे गलियारे से जब हम अंदर पहुंचे, तब वहां मंदिर के भीतर मंदिरों का संसार था। सबका अपना-अपना धार्मिक महत्व था। यह सनातन संस्कृति की उज्जवल झलक थी। त्रिदेव को समर्पित इस मंदिर में शैव और वैष्णव संप्रदाय का अद्भुत मेल था। मंदिर में ज्योर्तिलिंग की मुख्य मूर्ति शिव (स्थानु), विष्णु (माल) और ब्रह्मा (अयन) का प्रतिनिधित्व करती है। इन्हीं के आधार पर मंदिर का नाम थानुमालयन है। एक लिंग में सनातन धर्म के त्रिदेवों के प्रतिनिधित्व की परिकल्पना ने इसे अद्वितीय बना दिया था।
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| मंदिर का गलियारा |
मंदिर का दूसरा आकर्षण थी-एक अंचनेय या हनुमान की मूर्ति। ग्रेनाइट ब्लॉक से तराशी गई इस 22 फुट ऊंची मूर्ति को देख मन स्तब्ध हो गया था। यह भारत में अपनी तरह की सबसे ऊंची मूर्तियों में से एक कही जा सकती है। ऐसे ही मोर्टार और चूने से बनी नंदी की 21 फुट ऊंची मूर्ति भी हैरत में डाल रही थी। यह देश में सबसे बड़ी नंदी मूर्तियों में से एक है। मंदिर के विभिन्न स्तंभों में रामायण और महाभारत के विभिन्न दृश्य भी अंकित थे। केरल और तमिल वास्तु शैली को प्रतिबिंबित करते इस मंदिर के पत्थरों पर कारीगरी का कमाल नजर आ रहा था। जैसे, यहां एक ही पत्थर से उकेरे गए चार संगीत स्तंभ थे। ये लगभग 18 फुट ऊंचे थे। ये अलंकार मंडपम क्षेत्र में थे। खास बात यह थी कि इनसे टकराने या इन पर अंगूठा-उंगली रखने पर संगीतमय स्वरों की ध्वनि निकलने लगती थी। डांसिंग हॉल के नाम से जाने जाने वाले इस क्षेत्र में नक्काशी वाले 1035 अतिरिक्त स्तंभ भी थे।
कहा जाता है कि इस स्थान का नाम सुचिन्द्रम स्थल पुराण से पड़ा। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवों के राजा इंद्र को मंदिर में मुख्य लिंग के स्थान पर एक श्राप से मुक्ति मिली थी। मंदिर की वर्तमान चिनाई संरचना 9वीं शताब्दी में चोल वंश के दौरान बनाई गई थी। बाद में विस्तार का श्रेय थिरुमलाई नायक और त्रावणकोर महाराजाओं को दिया जाता है। इस क्षेत्र में प्रारंभिक और मध्यकालीन चोलों के साथ-साथ अन्य पांड्य शासकों और चेर शासकों के काल के कई शिलालेख हैं। यहां कोप्पाराकेसरीवर्मन के दो अभिलेख भी हैं, जिन्होंने परंतक प्रथम (907-950 ई.) के 30वें और 40वें शासनकाल के वर्ष में मदुरै और ईझाम (श्रीलंका) पर कब्ज़ा किया था। वर्तमान मंदिर का जीर्णोद्धार 17वीं शताब्दी में किया गया था। पहले मंदिर "थेक्कुमोन मैडम" द्वारा प्रशासित और नियंत्रित था, जो एक प्रसिद्ध नंबूदरी पुजारी परिवार था। अब मंदिर का रख-रखाव और प्रशासन धर्मपुरम के अधीन है। मंदिर में अलग-अलग समय पर सुबह 5:30 बजे से रात 9 बजे तक छह दैनिक अनुष्ठान होते हैं।
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| विवेकानंद केंद्र, यज्ञ मंडप |
स्वामी विवेकानंद की विरासत
हम पैदल घूमते-फिरते विवेकानंद केंद्र पहुंच गए थे। शांत, सुंदर और सुखद पर्यावरण शांति के गीत गाता हुआ सा नजर आ रहा था। हम प्रवेश द्वार से परिसर की ओर बढ़ रहे थे। दीवारों पर लिखे स्वामी विवेकानंद के ध्येय वाक्य हमें एक राह दिखा रहे थे। यह राह थी-सशक्त और समृद्ध होकर जीवन जीने की। अपनी अनंत क्षमताओं का विस्तार करने की। ब्रह्मांड की सबसे शक्तिशाली शक्ति मन को समझने की। क्योंकि, हम जैसा सोचते हैं वैसे बनते चले जाते हैं। हम वहीं हैं, जैसे हमारे विचार हैं। अपना जीवन बदलने और भविष्य का निर्माण करने की शक्ति हम सभी में हैं। सकारात्मक विचारों की शक्ति जीवन को रुपांतरित कर देती है। स्वामीजी के प्रेरक विचारों की एक लंबी शृंखला स्मृति सें उभर आयी थी। स्वच्छ एवं शांत हरे-भरे परिसर में जुनूनी मन सुकून की ठंडी बारिश का अनुभव कर रहा था। सब कुछ व्यवस्थित था यहां। यह भारतीय संस्कृति और परंपरा का एक संवाहक केंद्र था। वर्ष भर इस केंद्र में योग, अध्यात्म और वेदांत पर कार्यक्रम चलते रहते हैं। योग में रुचि रखने वालों के लिए यह एक स्वर्ग सा है। यह केंद्र स्वामी विवेकानंद की विरासत का प्रतिनिधित्व करता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक एकनाथ रानाडे की परिकल्पना से यह 1972 में साकार हुआ था। आज इसका विशाल परिसर एक छोटी टाउनशिप जैसा है। देश-दुनिया में अब इसकी पहचान है। वर्ष भर यहां अध्यात्म और योग प्रेमी आते रहते हैं।
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| रामायण दर्शनम् मंदिर |
सुंदर उपवन विवेकानंद केंद्र का श्रृंगार था। यहां की बेहद खूबसूरत इमारत आकर्षित कर रही थी। यह आधुनिक मंदिर जैसा था। एक खूबसूरत दर्शनीय स्थल। उपवन में भगवान शंकर की ध्यान मग्न मूर्ति थी। उनकी जटाओं से पानी की धार बह रही थी। दूसरी मूर्ति थी-धनुर्धारी श्रीराम की। मंदिर के प्रवेश द्वार पर श्री हनुमान की 27 फुट ऊंची ग्रेनाइट पत्थर की मूर्ति थी। यह मूर्तिकार की कल्पना का अद्भुत प्रयोग थी। करीब साढे़ तीन एकड़ क्षेत्र में फैले इस मंदिर परिसर में श्रीरामायण दर्शनम् यहां की दो मंजिला इमारत में स्थित था। मंदिर के अंदर का दृश्य चकित कर देने वाला था। 6 x 4 फुट (पैनल) आकार के 86 चित्रों में वाल्मीकि रामायण के प्रसंगों का बेहतरीन प्रदर्शन था। 22 पैनल भारत की मूल्य प्रणाली को आकार देने में रामायण के महत्व को दर्शा रहे थे। यह एक ऐसी प्रदर्शनी थी, जो राम और रामायण पर गहरे शोध का नतीजा थी।
चाहें वाल्मीकि, कंबन और गोस्वामी तुलसीदास द्वारा परिकल्पित रामराज्य की अवधारणा हो या फिर कविता, गद्य या नाटक के जरिए देश की सभी भाषाओं में लिखी गई रामायण। यहां तक कि ईरान, कंबोडिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, बर्मा, फिलीपींस, चीन, वियतनाम, श्रीलंका, थाईलैंड और जापान जैसे एशियाई देशों में भी रामायण पर आधारित जीवन का सविस्तार वर्णन था। पूर्वोत्तर भारत के सात राज्यों के लोक साहित्य में वर्णित रामायण के अनेक उद्वरणों का भी समावेश था। एक पैनल पर स्वामी विवेकानंद के रामायण के संदर्भ में रखे गए विचारों का उल्लेख था। श्री राम पंचायतन का संगमरमर का समूह, प्रदर्शनी की सुंदरता में चार चाँद लगा रहा था। इसी परिसर की ऊपरी मंजिल पर था-भारत माता सदनम्। यह वैदिक, पौराणिक और ऐतिहासिक काल में भारतीय मातृत्व को दर्शा रहा था। यहां भारत माता की मूर्ति स्थापित थी। इनके अलावा श्री पद्मनाभ, नटराज, स्वामी विवेकानंद और माता कन्याकुमारी की प्रतिमाएं भी यहां संजोयी गई थीं। प्रसिद्ध माताओं शकुंतला, जीजाबाई, पराशक्ति, यशोदा, माता सारदा, माता अमृतानंदमयी और गाइदिन्ल्यू की तस्वीरें सुंदर चित्रों के रूप में प्रस्तुत थीं। रामायण दर्शनम् के आधुनिक ऐक्रेलिक चित्रों की सचित्र प्रस्तुति करने वाले प्रसिद्ध कलाकार का नाम है- श्री टी भास्करदास। मंदिर परिसर को वास्तुकार श्री के. दक्षिणामूर्ति और श्री गणेशमूर्ति ने डिजाइन किया था ।
| कन्याकुमारी का सूर्योदय |
आत्मिक ऊर्जा का सूर्योदय
भारतभूमि पर यह एक ऐसा समुद्र तट है, जहां सूर्योदय और सूर्यास्त हर सैलानी को रोमांच से भर देता है। कन्याकुमारी में मेरा दूसरा दिन था। भोर होने से पहले ही आंख खुल गई थी। सूर्योदय देखना था। सुबह छह बजे से पहले ही हम समुद्र तट पर पहुंच गए थे। करीब छह बजे सागर के क्षितिज पर एक लालिमा छा गई थी। सूर्योदय हो रहा था। लग रहा था,-मानो गहरे समुद्र से सूर्य बाहर आ रहा है। अद्भुत और अवर्णनीय इस दृश्य ने ब्रह्मांड के अनसुलझे रहस्यों की ओर एक बार फिर से मुझे मोड़ दिया था। मेरे लिए यह निसंदेह सौभाग्य का क्षण था। आंखों ने सूर्योदय केअप्रतिम सौंदर्य ने निशब्द की दिया था। मेरी स्मृति में यह यादगार लम्हा जीवन भर के लिए कैद हो गया था। सूर्य से जुड़ने का अर्थ होता है-अपनी आत्मा से जुड़ना। और, अपनी आत्मा से जुड़ते ही हमारी ऊर्जा ब्रह्मांड के विराट अस्तित्व में लय होने लगती है। सारे संताप स्वत: मिट जाते हैं। बाहर के सूर्योदय के साथ-साथ हमारे आंतरिक जीवन में भी सूर्योदय होता है। हम अपने ही प्रकाश से जगमगा उठते हैं। यह आत्मप्रकाश अभाव की कालिमा को मिटा देता है। नवसृजन का यह सूत्रपात करता है। अभाव मिटते ही जीवन का समृद्ध होना स्वाभाविक है। उदित सूर्य हमारे लिए समृद्धि का आह्वान था।
विचारों के विचलन का सूर्यास्त
शाम को हम कन्याकुमारी से करीब पांच किलोमीटर दूर सूर्यास्त को देखने पहुंचे थे। सागर किनारे पत्थर और बड़ी चट्टानें थीं। सैलानियों का यहां मेला सा लगा हुआ था। हवा काफी तेज थी। लहरों में आक्रामकता थी। चट्टानों से टकराती लहरें दिल दहला रही थीं। शाम का वक्त था। उनकी दहाड़ दूर तक सुनी जा सकती थी। लहरों की टकराहट से दस-दस फुट तक पानी को उछलते देखना बेहद रोमांचकारी अनुभव था। हम कुछ पत्थरों से होते हुए कुछ आगे बढ़ गए थे। गुजरात का एक ग्रुप हमारे साथ था। हम सब अविस्मरणीय लम्हे अपने-अपने मोबाइल में कैद कर रहे थे। सूरज धीमे-धीमे छिप रहा था। लहरें रंग बदल रही थी। बादलों के बीच व्योम में धुंधलापन छाने लगा था। हमारी आंखें कभी सूरज की ओर टिक जाती थीं, तो कभी समुद्र की ओर। मन दोनों ही दृश्यों आंखों में बसा लेने के लिए बेताब था। कुदरत की यह लीला हमें समय के पार ले जी रही थी। धरती के सूर्यास्त के साथ ओज मेरे विचारों के विचलन का भी सूर्यास्त हो रहा था। शरीर और मन हल्का हो गया था। एक निश्चिंतता का आगमन हुआ था। यह निश्चिंतता थी-अपने स्वभाव में बहने की। उन्मुक्त होकर जीने की। अस्ताचल सूर्य ने एक संदेश दिया था। यहां कुछ भी स्थायी नहीं है। सब कुछ बदलता रहता है। बदलाव को स्वीकार करते हुए जिंदगी जीने में ही आनंद है। वैसे भी यह दुनिया एक रंगमंच ही तो है और हम सब कलाकार। हमारी एक भूमिका है। यह भूमिका ही हमें हमारा उद्देश्य बताती है। उद्देश्यपूर्ण जीवन जोश, जज्बे और जुनून को आमंत्रित करता है। तब यह जीवन न सिर्फ अपने लिए, बल्कि समग्र अस्तित्व के लिए भी सार्थक हो जाता है। हम रंगकर्म और कला के बारे में सोचते-सोचते हम उसी ओर चल पड़े थे।
कथकली नृत्य नाटिका : सीता स्वयंवर
कथकली और भरत नाट्यम्
सूर्यास्त के साथ रात हो गई थी। रंगमंच हमारा इंतजार कर रहा था। कन्याकुमारी से करीब पांच किलोमीटर दूर। बेहद खूबसूरत रंगमंच था यह। लाइट, साउंड और स्मोक का बेहतरीन संयोजन। क्लासिकल म्यूजिक का फ्यूजन। स्वर लहरियों और उन पर डांस करते कलाकारों ने धूम मचा दी थी। केरल की पारंपरिक शैली में कथकली, भरत नाट्यम् और नृत्य नाटिका में हमारी चेतना डूबी हुई थी। देव आराधना से शुरू हुए क्लासिकल डांस ने हृदय वीणा के तारों को छेड़ दिया था। यह आनंदोत्सव था। क्लासिकल और मॉर्डन म्युजिक के फ्यूजन ने ऐसी तान छेड़ी थी कि संगीत के सप्तरंगों का संसार बन गया था। सधे हुए पदचाप, अद्भभुत भाव-भंगिमाएं और गतिमय नृत्य की मनोहारी मुद्राएं मनुष्य में छिपे रस-रंग के रहस्यमय संसार को बयां कर रही थीं। भरत नाट्यम् देखते-देखते ध्यान सा लग गया था। रसपूर्ण कथकली का पूरा संयोजन सीता स्वयंवर पर केंद्रित था। इसमें म्यूजिक और अभिनय के अलग-अलग पैटर्न थे। आंखों से संवाद। भृकुटियों से इशारे। कथा को समझातीं भाव-भंगिमाएं। चंचल चितवन। एक के बाद एक प्रस्तुति से समां बंध गया था।
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| कथकली, भरत नाट्यम् के कलाकार |
नृत्य, संगीत और अभिनय के अनूठे तालमेल ने जीवन को रसमय बना दिया था। यह उसी रस रूप की एक झांकी थी, जिसे तैत्तिरीयोपनिषद् उपनिषद का सूत्र उद्घोषित करता है। सूत्र है-
“ रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति।“
वह (परमात्मा) रस रूप है। जहां भी जीवन में रस है, वहां आनंद होगा ही। और, जहां आनंद है, वहां परमात्मा अपनी झलक दिखाता है। कथकली और भरत नाट्यम् को देख मन आनंद विभोर हो गया था। शो के समापन से पूर्व एक अपूर्व घटना घटी थी। शो के प्रोड्यूसर ने अचानक मुझे रंगमंच पर बुला लिया था। एक-एक कर उन्होंने सारे कलाकारों से मेरा परिचय कराया था। उनके साथ हमारा फोटो सेशन भी हुआ। यह एक यादगार क्षण था। देर रात हो गई थी। मधुर स्मृतियों के साथ मैं यहां से विदा हुआ था।
स्वामी विवेकानंद रॉक मेमोरियल
आज कन्याकुमारी में मेरा आखिरी दिन था। सुबह के नौ बजे थे। मुझे स्वामी विवेकानंद रॉक मेमोरियल जाना था। स्टीमर का टिकट लेने वालों की काफी भीड़ थी। पर, था सब व्यवस्थित। तट पर खड़े स्टीमर और फेरी जहाज लोगों को रॉक मेमोरियल तक लाने-ले जाने में लगे थे। करीब पंद्रह मिनट में हम विवेकानंद रॉक पर पहुंच गए थे। सागर के बीच यह रॉक सम्मोहित सा कर रही थी। रॉक पर बने ध्यान मंडप की गुम्बद पर केसरिया ध्वज लहरा रहा था। नीले और लाल ग्रेनाइट के पत्थरों से बने इस स्मारक का गुंबद करीब 70 फुट ऊंचा था। स्मारक की चट्टान को लक्षद्वीप सागर घेरे हुआ था। पास में ही बंगाल की खाड़ी, हिंद महासागर और अरब सागर का संगम हो रहा था। यहां से नीले सागर और नीले आसमान को देख मन भाव-विह्वल हो गया था। सरसराती समुद्री हवा ताजगी से भर दे रही थी। मंद स्वर में शास्त्रीय संगीत की धुनें अंतस की ऊर्जा को जाग्रत कर रही थीं। हम सीढ़ियां चढ़कर ध्यान मंडप में पहुंचे थे। द्वार से प्रवेश करते ही हमारे ठीक सामने परिव्राजक स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा थी। करीब चार फुट के प्लेटफार्म पर साढ़े आठ फुट ऊंची। यह यह प्रतिमा कांसे से बनी हुई है। विवेकानंद रॉक मेमोरियल खुद एक ऋषि की तरह ही कालातीत नजर आ रहा था। स्वामी विवेकानंद के बारे में कहा जाता है कि वे तैरकर समुद्र के बीच स्थित इस टापू तक पहुँचे थे। उन्होंने यहां तीन दिन और रात ध्यान किया था। कुछ का मत है कि उन्हें यहां पर ही आत्मज्ञान प्राप्त हुआ था। स्वामी जी 1892 में कन्याकुमारी पहुंचे थे।
| विवेकानंद रॉक मेमोरियल, ध्यान मंडप |
ब्रह्मांड से जुड़ी हुई है मन की शक्ति
ध्यान मंडप के शांत परिसर में स्वामी विवेकानंद विचार जीवंत हो उठे थे। स्वामी जी कहते थे-“ दिल और दिमाग के बीच संघर्ष में, अपने दिल की सुनो। हर परेशानी से बाहर निकलने का एक ही उपाय है-अपने मन को शक्तिशाली बनाओ। ब्रह्मांड में सभी मन आपस में जुड़े हुए हैं। अपने मन को नियंत्रित करने से सभी के मन नियंत्रित हो जाते हैं। आपकी इच्छा शक्ति/संकल्प शक्ति आप में सतत दिव्य ऊर्जा का संचार करती रहती है। आत्म जागरण से ही देश और समाज का पुनरुत्थान हो सकता है। स्वामी जी का ध्येय वाक्य मुझे मेरा भविष्य दिखा रहा था। यह वाक्य था-"उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।” उठो, जागो और तब तक नहीं रुको, जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो जाए। यहां मन में एक प्रश्न उभरा था। मेरा लक्ष्य क्या है ?-एक उत्तर भी सामने आया था-समग्र सृष्टि के बीच आत्मबोध। न कहीं भागना और न ही कुछ छोड़ना। हर परिस्थिति में संतुलन। मध्य मार्ग का अनुसरण। ध्यान मंडप ध्यान के अलावा आत्मचिंतन के लिए भी मुझे अच्छी जगह लगी। शिला स्मारक पर हमने काफी समय बिताया था। यहां की मनोरम छवि और स्वामीजी की स्मृति हृदय पर छा गई थी। स्वामी जी की प्रतिमा को प्रणाम करने के बाद हम पास में ही स्थित तमिल संत तिरुवल्लुवर की विशालकाय प्रतिमा की ओर मुखातिब हो गए थे।
संत तिरुवल्लुवर की मूर्ति
तमिल कवि और दार्शनिक तिरुवल्लुवर की मूर्ति न्यूयॉर्क हार्बर में स्थित स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी की मूर्ति की याद दिला रही थी। 38 फुट के प्लेटफार्म पर खड़ी यह मूर्ति करीब 95 फुट ऊंची थी। मूर्ति का सिर काफी ऊंचाई पर था। तिरुवल्लुवर ने तमिल समाज में एक सुधारक की बड़ी भूमिका निभाई थी। वे धर्म और नैतिकता की पहचान थे। तमिल में लिखे गए उनके ग्रंथ थिरुक्कुरल की यहां काफी मान्यता है। थिरुक्कुरल ग्रंथ की तीन पुस्तकों में से पहली, सदाचार के 38 अध्यायों का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि दूसरी और तीसरी पुस्तक धन और प्रेम का प्रतिनिधित्व करती है। मूर्ति का डिजाइन उनके इस संदेश को दर्शाता है कि धन और प्रेम को ठोस सदाचार की नींव पर ही अर्जित और भोगा जा सकता है। मूर्ति के दाहिने हाथ की तीन उंगलियां आकाश की ओर इशारा करती हैं। यह थिरुक्कुरल ग्रन्थ के उन तीन सर्गों के बारे में बताती हैं जो सदाचार, धन और प्रेम का आधार हैं। कमर के चारों ओर थोड़ा सा मोड़ लिए हुए यह मूर्ति नटराज जैसे हिंदू देवताओं की नृत्य मुद्रा की याद दिलाती है। लगभग 7,000 टन की यह मूर्ति तमिल संस्कृति का गौरव है। कन्याकुमारी के किसी भी तट से इस मूर्ति को देखा जा सकता है। विवेकानंद रॉक मेमोरियल और मूर्ति की वास्तुकला एक ही शैली में है। रात के वक्त विवेकानंद रॉक मेमोरियल और संत तिरुवल्लुवर की मूर्ति रंग-बिरंगी रोशनी में नहा उठती हैं। सागर के बीच एक अलौकिक दृश्य निर्मित हो जाता है।















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