Varkala beach and sun rays dancing on the ocean waves
दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय॥
यह है वरकला का समुद्र
तट। केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम से करीब 41 किलोमीटर दूर। यहां के लोग इसे पाप नाशम्
समुद्र तट भी कहते हैं। यह एक ऐसा स्थान है जहां भोग और योग का आवेग जीवन के द्वंद
को प्रतिबिम्बित करता नजर आता है। हम यहां नौ जुलाई को पहुंचे थे। हमारी आठ जुलाई की
रात अलप्पुझा (अलेप्पी) में गुजरी थी। अलप्पुझा के समुद्र तट पर हमने रेल सी दौड़ती
लहरों के दीदार किए थे। बहुत ही रोमांचक अनुभव था। खासतौर से रात में। खुला आसमान और
अपनी हदें पार करतीं सागर की तेज लहरें। यह एक भय मिश्रित मजा था। समुद्र तट पर हम
देर रात तक रुके थे। और, सुबह अलप्पुझा से वरकला के लिए निकले थे। अलप्पुझा से वरकला
की दूरी करीब 110 किलोमोटर है। यह यात्रा हमने बस से की। त्रिवेंद्रम जाने वाली बस
ने हमें कोल्लम होते हुए परिप्पल्ली में उतारा। परिप्पल्ली से वरकला करीब 12 किलोमीटर
दूर है। यहां से लोकल बस ही वरकला शिवगिरी तक जाती है। लेकिन, उसका कोई निश्चित समय
नहीं है। बस के इंतजार में हमें यहां कुछ देर रुकना पड़ा।
सरकारी शिक्षा का शानदार मॉडल
प्रकृति का मनभावन
श्रृंगार
वरकला जाने के लिए लोकल बस आ चुकी थी। पुरानी सी बस और खुली खिड़कियां। न विंड स्क्रीन और न ही खिड़कियों पर शीशे। हमारी बस परिप्पल्ली से वरकला शिवगिरी की पहाड़ियों से गुजर रही थी। हम खुली खिड़कियों से प्रकृति के मनभावन श्रृंगार से सम्मोहित हो रहे थे। हर्षातिरेक स्वाभाविक था। वनाच्छादित पहाड़ियां और गोल-गोल घूमती बस। कहीं तेज धूप से चमचमाते पेड़-पौधे तो कहीं उमड़ते-घुमड़ते बादल। एक सुरम्य सफर था यह। मानसून ने प्रकृति में रास-रंग की तान छेड़ी हुई थी। हरे-भरे शांत और खुशहाल वातावरण में ध्यान-सा लग गया था। मौसम गर्म था। उमस थी। पर, बस की खुली खिड़कियों से आती ताजी हवा खुशनुमा बनाए हुए थी। बस में ज्यादातर कामकाजी ग्रामीण महिलाएं थीं। सबकी एक ही भाषा थी-मलयालम। यह केरल के ग्राम्य जीवन की एक झांकी थी। श्रम और संघर्ष उनके चेहरों व लिबास में झलक रहा था। भोले से चेहरों से चमकती सरलता ने मुझे आत्म-विभोर कर दिया था। अपने ही देश में मैं एक अलग दुनिया देख रहा था। करीब आधे घंटे के सफर के बाद हम वरकला में थे।
वरकला की धरती को
प्रणाम !
रिमझिम बारिश। सुहावना
मौसम। छोटी-छोटी पहाड़ियां। सुंदर सड़कें। दोनों ओर फुटपाथ। व्यस्त रेलवे स्टेशन। मददगार
लोग। आस्थावान समाज। हमारी खुली आंखों में एक चलचित्र सा चलने लगा था। वरकला में हमारा
स्टे समुद्र तट पर आर्ट विला में था। यह बस स्टेशन से करीब तीन किलोमीटर दूर था। वरकला
को करीब से देखने की इच्छा थी। इसलिए, हमने आटो की बजाय पैदल ही आर्ट विला की ओर प्रस्थान
किया। प्रकृति की कलाकारी हमारे दिल को छू रही थी। कभी-कभी पैर ठिठक जाते थे। रंग-कर्म
यहां की रगों में बसा हुआ था। हर दिन इवेंट थे-मलयाली संस्कृति के। ऊंची-नीची पहाड़ियों
और घुमावदार गलियों से होते हुए हम आर्ट विला पहुंचे थे। यह केरल के सांस्कृतिक रंग
में रंगा हुआ था। एक सुंदर सी लायब्रेरी थी। और, अपूर्व शांति। गार्डन में खिले फूल
मुस्करा रहे थे। लग रहा था-जैसे वे मौन संवाद कर रहे हों। दीवारों पर चित्रकारी कहानी
बयां कर रही थीं। दोपहर हो चुकी थी। बारिश से मौसम ठंडा हो गया था। आसमान में सूरज
और बादलों के बीच लुका-छिपी का खेल चल रहा था। सामान्यत: जून-जुलाई में वरकला बारिश
में भीगा रहता है। यहां एक बार शुरू हुई बारिश कम से कम पंद्रह दिन अनवरत होती रहती
है। शहर ठहर जाता है। सैलानियों से समुद्र तट सूना हो जाता है। लेकिन,अक्टूबर से मार्च
तक वरकला का नीला आसमान, चांदी सा चमकता सागर और सुहावना मौसम सैलानियों की सैरगाह
बन जाता है।
अरब सागर का अद्भुत नजारा
अब तक हम अरब सागर
को कोझिकोड, वाइपोर, कोच्चि और अलप्पुझा में देखते हुए आ रहे थे। हर तट का अपना सौंदर्य
था। लेकिन, वरकला समुद्र तट इन सबसे अलग था। मैं दोपहर को समुद्र तट पर पहुंचा था।
हम एक ऊंची-विस्तृत चट्टान पर थे और समुद्र तट लगभग 100-150 फुट नीचे था। यह चट्टान
एक पहाड़ी जैसी थी। नीचे जाने का कोई रास्ता न था। चट्टान के किनारे चार किलोमीटर लंबा
एक संकरा सा कच्चा रास्ता था। रास्ते के एक तरफ सागर और दूसरी तरफ रिसोर्ट्स, रेस्तरां, कैफे। यहीं से सागर की लहरों की अठखेलियां देखी जा सकती थीं। लहरों की रफ्तार
40-50 किमी प्रति घंटे लगती नजर आ रही थी। हम संकरे रास्ते से तटों पर टकराती लहरों
का बबंडर देख रहे थे। दौड़ती आ रही लहरों पर सूरज की किरणें नाच रही थीं। जीवन के रंगों
की तरह सूर्य के रंग बदल रहे थे। जल जीवन का नर्तन आंखों में समाता चला जा रहा था।
ऊंचाई से समुद्र और सूर्य को एक साथ देखने का अनुभव अद्भुत था। सागर और सूरज अपने परम
सौंदर्य से दैदीप्यमान थे। विचार शून्य मन कुछ भी सुनने-समझने को राजी न था। एक इंसानी
जिंदगी में यह आग और पानी का मिलन था। हमारी अपनी ही ऊर्जा के स्रोत की मिलन। गुण-धर्म
विपरीत, फिर भी जीवन चलता इन्हीं से है। यह “विपरीत” का आकर्षण ही है जो एक-दूसरे को
संभाले रखता है। यह जीवन के द्वंद का एक छंद भी है। द्वंद खत्म, जीवन खत्म। द्वंद से
सृजन होता है। और, द्वंद से ही विध्वंस। सागर और सूरज के बीच मन थोड़ा दार्शनिक हो गया
था। संत कबीर के शब्द मेरे मन में जाग्रत हो गए थे। जीवन-जगत के द्वंद के बारे में
वह कहते थे-
चलती चक्की देखकर दिया कबीरा रोय।
दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय॥
वरकला समुद्र तट और
अप्रतिम सूर्यास्त
समुद्र तट पर घूमते-घूमते
शाम हो गई थी। अब तट के संकरे मार्ग पर भीड़ बढ़ने लगी थी। यह सूर्यास्त का समय था। आसमान
साफ हो, तो समुद्र तट से पल-पल अस्त होते सूर्य को देखना रोमांच पैदा कर देता है। सागर
के किनारे बने कैफे और रेस्टोरेंट शाम होते ही जगमगा उठते हैं।। ज्यादातर कैफे पश्चिमी
दुनिया का एहसास कराते हैं। यहां को हर कैफे बेहद खूबसूरत है। मेरे लिए यह तय करना बड़ा मुश्किल था कि किसे सबसे ज्यादा खूबसूरत कहा जाए। सूर्यास्त के समय कैफे/रेस्टोरेंट की दूसरी
मंजिल पर सारी सीटें लगभग फुल हो चुकी थीं। चाय की चुस्कियों और स्नैक्स के साथ लोगों
की निगाहें अस्त होते सूर्य पर टिकी हुई थीं। सागर पर पड़ती सूरज की किरणें लहरों को सुनहरा सा कर दे रही थीं। यहां सूरज, सागर में समाता हुआ सा दिख रहा था। मेरे लिए अस्त
होते सूर्य और सागर के मिलन को शब्दों में व्यक्त कर पाना असंभव है। इधर सूर्य अस्त
हो रहा था और उधर वरकला का समुद्र तट गुलजार हो रहा था। रंग-बिरंगी रोशनी से सागर किनारे
का बाजार जगमगा उठा था। हर तरफ रौनक ही रौनक थी। हंसते-खेलते लोग मनोरंजन के मूड में
थे।
खाने-पीने के शौकीनों के लिए जन्नत
यहां के कैफे और नाइट
लाइफ गोवा से बिल्कुल अलग है। चाहें वह साउथ गोवा हो या फिर नॉर्थ गोवा, दोनों ही जगह ज्यादातर जगर खाने-पीने का एक ही सा पैटर्न देखने को मिलता है। लेकिन, वरकला के
कैफे और रेस्टोरेंट थोड़े अलग हैं। हर कैफे की अपनी एक स्पेशिलिटी है। भारतीय और पश्चिमी संस्कृति का अनोखा मेल है। सी-फूड और नान वेज के शौकीनों के लिए लगभग सब कुछ यहां है।
ऐसे ही वेज या वेगान के लिए भी स्वादिष्ट भोजन और शेक आदि बहुत कुछ है। खाने से भी
ज्यादा मुझे यहां के कैफे और रेस्टोरेंट के इंटीरियर ने प्रभावित किया। लकड़ी से बनी
झोपड़ियां, दीवारों पर कलाकृतियां, सीटिंग अरेंजमेंट और रोशनी का अद्भुत संयोजन मन को
खुशगवार कर देने वाला था।
मेरी शाम दार्जिलिंग कैफे में गुजरी थी-चाय के साथ। यहां से ही हमने सूर्यास्त का नजारा देखा था। विशाल ड्रीमकैचर और मोमबत्ती की रोशनी वाली टेबल। जोड़ों में बैठे लोग। सामने विशाल समुद्र। बैकग्राउंड की लाइटिंग और म्यूजिक। एड शिरीन, एनरिक इगलिसियस, ब्रायन एडम्स, मॉर्क अम्बर, कोल्ड प्ले और दुआ लीपा के गाने। म्यूजिक ने मुझे बांध रखा था। लग रहा था, जैसे कोई मेरी प्लेलिस्ट को प्ले कर रहा हो। समय का एहसास ही खो गया था। बहुत ही मजेदार थी यह शाम। यहां नान वेज और वेज खाने की भी लंबी फेहरिस्त थी। पर, मुझे ताजे फलों और जूस के लिए कैफे नोमैड पहुंचना था। यह नॉर्थ क्लिफ में है। हमने करीब एक घंटे इस कैफे में बिताया। यहां भारतीय और कॉन्टिनेंटल व्यंजन तो लाजवाब थे ही। रोमांटिक मूड के भी भरपूर मौके थे। प्रकृति के मनोरम दृश्यों से सजा यह कैफे समुद्री हवा का आनंद लेने के भी एक अच्छी जगह थी। थिएर बुद्ध बाउल्स, चारकोल ग्रिल्ड फिश और बटर के साथ प्रॉन्स के लिए यह कैफे काफी मशहूर है। कैफे इटालिनो को मैंने डिनर के लिए चुना था। समुद्र का नजारा, लाजवाब खाना और बढ़िया माहौल, ये तीनों यहां एक साथ थे। नीली-सफेद रोशनी, बेहतरीन पेंटिंग्स और बैकग्राउंड में लॉर्ड बुद्धा की मूर्ति, शाकाहारी जैविक भोजन, मेरे लिए बहुत कुछ था यहां। सबसे दिलचस्प था-बैक ग्राउंड म्यूजिक में एपी ढिल्लन और सतिंदर सरताज के गाने। पंजाबी माहौल सा बन गया था यहां। इटालिनो के ठीक नीचे सी-फूड कैफे था। देश-दुनिया के आप चाहें किसी कोने से आए हों, यहां सी-फूड का हर आइटम ऑन डिमांड उपलब्ध था। इनके अतिरिक्त यहां पर सोल फूड कैफे, इन दा कैफे, इको पुछेनी लाला आर्ट कैफे और कॉफी टैम्पल आदि भी बेहतरीन कैफे माने जाते हैं।
कैफे और लाइव म्यूजिक शो
गॉड्स ऑन कंट्री किचन कैफे में लाइव म्यूजिक शो करीब से देखने की ख्वाहिश पूरी हुई। तमिल, मलयालम और हिंदी गीतों का संगम था यहां। म्यूजिशियन और सिंगर मलयाली थे। कैफे फुल था। यहां आने वाले ज्यादातर तमिल और मलयाली थे। आर्केस्ट्रा की धुनों, तमिल और मलयाली गानों पर बच्चे-बूढ़े सभी थिरक रहे थे। नान स्टाप म्यूजिक में हिंदी फिल्मों के गीतों के मुखड़े भी गाए जा रहे थे। सबसे दिलचस्प था-गिटार और ड्रम का म्यूजिक कॉम्बिनेशन। बेस और एक्वास्टिक गिटार की जोशीली धुनें दिल को छू रही थीं। गिटारिस्ट युवा थे। उनमें अपने हुनर का बेहतरीन प्रदर्शन करने का जुनून झलक रहा था। वे अपने साज के साथ खोए हुए थे। समुद्र तट पर हवा में बहती स्वर लहरियों ने एक नया जीवन सा प्रदान कर दिया था। ऐसा नहीं, लाइव म्यूजिक इसी कैफे में था, यहां और भी ऐसे कैफे हैं जो लाइव म्यूजिक का आयोजन करते हैं। यदि आप गाने या कोई साज बजाने का हुनर रखते हैं, तो यहां वह भी अभिलाषा पूरी हो जाती है। म्यूजिक भरपूर मजा लेने के बाद हम रात 12 बजे आर्ट विला पहुंच गए थे।
पापनाशम समुद्र तट
वरकला समुद्र तट को पापनाशम समुद्र तट भी कहा जाता है। यहां के कुछ हिस्सों में लोग अपने शवदाह किए गए रिश्तेदारों की राख और अस्थियां समुद्र में प्रवाहित करते हैं। यह करीब-करीब वैसा ही होता है, जैसे उत्तर भारत के लोग शवदाह किए गए रिश्तेदारों की अस्थियां गंगा में विसर्जित करने जाते हैं। यहां मान्यता है कि समुद्र में राख-अस्थियां विसर्जित करने से जीवत्मा को शांति मिलती है और उसके पाप नष्ट हो जाते हैं। वरकला के नाम को लेकर भी यहां कई मिथक प्रचलित हैं। कहा जाता है कि एक वक्त में तीर्थयात्रियों का एक समूह यहां से गुजरा था। उस वक्त नारद ऋषि यहां थे। यह समूह उनके पास पहुंचा और उन्हें अपने पापों के बारे में बताया। उनसे पापों से मुक्ति का उपाय पूछा। तब, ऋषि नारद ने अपना वल्कलम (पेड़ की छाल से बनी लंगोटी) फेंकी। यह वल्कलम इस सुंदर क्षेत्र में गिरी। मान्यता है कि इसी कारण इस स्थान को वरकला के नाम से जाना जाने लगा। तीर्थयात्रियों के लिए यह "पापनासम" बन गया यानि पापों से मुक्ति का स्थान। नारद ने पापों से उद्धार के लिए यहां प्रार्थना करने का उपदेश भी दिया। वरकला का आस्थावान समाज आज भी इस परंपरा का निर्वाह कर रहा है। तड़के सुबह मंदिर की घंटियां बज जाती हैं। कई जगह प्रार्थना का समस्वर सुनाई देता है।
शिवगिरि : योग और अध्यात्म का संगम
दक्षिण भारत में वरकला को एक तीर्थस्थल की भी मान्यता प्राप्त है। यहां आत्मज्ञानी संत श्री नारायण गुरु की समाधि स्थित है। नारायण गुरु प्राकृतिक सौंदर्य के प्रेमी थे। उन्होंने शिवगिरी पहाड़ी की चोटी पर 1904 में एक आश्रम बनाया था। वे यहीं रहने लगे थे। आश्रम के चारों ओर उन्होंने पौधे उगाए। पहाड़ी का हरा-भरा किया।एकांत और वनस्पतियों से छायी यह पहाड़ी लोगों का ध्यान आकर्षित करने लगीं। बाद में इसे शिवगिरी मठ कहा जाने लगा। नारायण गुरु “ एक जाति, एक धर्म और एक ईश्वर” की अवधारणा का प्रचार करते थे। उन्होंने 1909 में यहां ज्ञान की देवी मां शारदा के मंदिर की नींव रखी। अप्रैल 1912 में यहां मां शारदा की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा हुई। इस अष्टकोणीय मंदिर को गुरु ने शारदा मठ कहा। इस मंदिर में नैवेद्यम (देवी को भोजन अर्पित करना) या अभिषेकम (मूर्ति पर तेल, घी और इस तरह की चीजें डालना) का प्रचलन नहीं है। यहां भक्त भजन गाकर देवी की पूजा करते हैं। सफेद कमल पर विराजमान सरस्वती की मूर्ति पवित्रता पर खिलने वाले ज्ञान को रेखांकित करती है। गुरु नारायण ने यहां हाशिए पर खड़े लोगों में जीने की हिम्मत पैदा की। उन्हें गले लगाया। योग और अध्यात्म की लहर ने वरकला को खुशहाली से भर दिया। आज यहां के शांत वन में साधना और ध्यान के लिए दक्षिण भारत के लोग खासतौर से आते हैं। यहां गुरु की समाधि पर हर साल 30 दिसंबर से 1 जनवरी के बीच विशेष आयोजन होते हैं। इसे शिवगिरी तीर्थदानम् कहा जाता है।
दोपहर करीब दो बजे थे। बूंदा-बांदी हो रही थी। हम बैक वाटर के स्टार्टिंग प्वाइंट पर पहुंच गए थे। यहां हमारी मुलाकात बशीर से हुई। यह लग्जरी हाउस बोट और शिकारा, दोनों को मैनेज करते हैं। मुझे शिकारा से बैक वाटर का सफर करना था। करीब चार घंटे के लिए। और, हमारा पानी पर सफर शुरू हो गया। नहरों के बीच से होते हुए हम ठहरे पानी के ऐसे विशाल क्षेत्र में पहुंच गए, जहां पानी पैर तैरती लग्जरी हाउस बोट, स्टीमर और छोटी-छोटी नावें हर तरफ आती-जाती नजर आ रही थीं। एक से बढ़कर एक हाउस बोट। यहां मुझे श्रीनगर की डलझील में हाउस बोट में बिताए समय की भी याद आई। वहां हमने दो दिन गुजारे थे। उसकी तुलना में अलेप्पी में हाउस बोट का सफर बिल्कुल अलग है। वहां झील के चारों ओर पहाड़ नजर आते हैं और चारों ओर हरियाली ही हरियाली। रसीले हरे रंग के धान के खेतों, सुडौल चावल के बजरों और किनारे पर बसे ग्रामीण जीवन को निहारना मेरे सबसे मंत्रमुग्ध करने वाले सुंदर अनुभवों में से एक था। यहां मानसून ने प्रकृति को रहस्य और रोमांच से भर दिया था।
कौन तुम! संसृति-जलनिधि तीर
तरंगों से फेंकी मणि एक,
कर रहे निर्जन का चुपचाप
प्रभा की धारा से अभिषेक!
मधुर विश्रांत और एकांत—
जगत का सुलझा हुआ रहस्य,
एक करुणामय सुंदर मौन
और चंचल मन का आलस्य!”
एक झिटका-सा लगा सहर्ष,
निरखने लगे लुटे-से, कौन—
गा रहा यह सुंदर संगीत?
कुतूहल रह न सका फिर मौन!
और देखा वह सुंदर दृश्य
नयन का इंद्रजाल अभिराम;
कुसुम-वैभव में लता समान
चंद्रिका से लिपटा घन श्याम।
साहित्य का संसार ही ऐसा है जो हमें अनेक अर्थों में खुद से जोड़ता है। गीत-कविताओं को गुनगुनाते हुए हम अब जलीय किनारे पर एक छोटे से रेस्टोरेंट में थे। पानी पर लंबे सफर के बाद चाय-स्नैक्स के लिए यह एक अच्छी जगह थी। यहीं पर एक केरलवासी अपना बाज लेकर आ गया था। उसने पहले उसे हमारे कंधे पर बैठाया और फिर हमारे हाथ पर। परिंदे से दोस्ती के रूप में हमारी यह पहली मुलाकात थी।
जंगलों और गांवों से गुजरती नाव
हम यहां से बैक वाटर के पास गांवों की तरफ चल पड़े थे। महिलाएं और बच्चे अपने-अपने शिकारे (नाव) के साथ काम पर निकले हुए थे। कुछ जगहों पर एक पार से दूसरे पार जाने के लिए छोटे खूबसूरत पुल भी बने हुए थे। यह कुछ-कुछ इटली के वेनिस शहर जैसा नजारा था। वेनिस समृद्ध है लेकिन यहां समृद्धि के लिए कठोर संघर्ष है। काफी कुछ यहां होना बाकी है। हमारी नाव गांवों से घने जंगलों की ओर बढ़ रही थी। गहरी शांति के आवेश मे हम लिपटे हुए थे। सच, यह मेरे सपनों का एक चमत्कारिक संसार था। मेरी अंतरात्मा आह्लादित थी। आज हम इस नियम के साक्षी थे कि हम जिसके साथ शिद्दत से जुड़ते हैं, हम वैसे ही हो जाते हैं। हमारा पर्यावरण, हमारा आस - पास हमें अपने जैसा बना ही देता है। जीवन के हर दौर में पहले हमारा आस -पास बदलता है, फिर हमारा जीवन बदलता है। एक खुशहाल जीवन खुशियों की दस्तक दे जाता है। और, उदासी व निराशा से भरा जीवन हमारे खुशहाल भरे जीवन में भी हताशा के पद चिन्ह छोड़ जाता है। कई मायनों में मेरे लिएअलेप्पी के अविस्मरणीय का सफर को शब्दों में बयां कर पाना बहुत मुशि्कल है। क्योंकि, यह एक अनुभव है। बहरहाल, अलेप्पी बैकवाटर्स शांति और रोमांच की तलाश करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए एक अविस्मरणीय जगह है। ज़रूर जाना चाहिए। हर कोई यहां के शांत जलमार्ग और हरी-भरी हरियाली को देखकर तरोताजा हो सकता है। चाहे आप अकेले यात्रा कर निकले हों या परिवार या फिर अपने प्रियतम के साथ अलेप्पी बैकवाटर्स सभी के लिए कुछ न कुछ प्रदान जरूर करता है।
अलेप्पी के बैकवाटर सदियों से केरल के इतिहास और संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इन जलमार्गों का ऐतिहासिक रूप से व्यापार और परिवहन के लिए उपयोग किया जाता था, जो दूरदराज के गांवों और कस्बों को जोड़ते थे। पारंपरिक हाउसबोट, जो मूल रूप से चावल और मसालों के परिवहन के लिए उपयोग किए जाते थे। अब ये शानदार फ़्लोटिंग होटलों में बदल दिए गए हैं।
बैकवाटर केरल की संस्कृति और परंपराओं के साथ गहराई से जुड़े हुए हैं। स्थानीय समुदायों ने इन जलमार्गों के इर्द-गिर्द केंद्रित एक अनूठी जीवन शैली विकसित की है। ओणम के त्यौहार के दौरान आयोजित होने वाली वार्षिक स्नेक बोट रेस बैकवाटर के सांस्कृतिक महत्व का प्रमाण है। ये दौड़ न केवल स्थानीय लोगों की प्रतिस्पर्धी भावना को प्रदर्शित करती हैं, बल्कि उनकी विरासत से उनके गहरे जुड़ाव को भी दर्शाती हैं।
बैकवाटर एक अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र बनाते हैं जो वनस्पतियों और जीवों की विविध श्रेणी की मदद करता है। आर्द्रभूमि और मैंग्रोव वन क्षेत्र के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये बैकवाटर कई प्रकार की मछलियों और पक्षियों के लिए भी महत्वपूर्ण आवास हैं, जिनमें प्रतिवर्ष इस क्षेत्र में आने वाली प्रवासी प्रजातियां भी शामिल हैं।
कन्याकुमारी : सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का समृद्ध संसार, रहस्य और रोमांच से भर देता है तीन सागरों का मिलन विवेकानंद रॉक मेमोरियल ...