Sunday, 8 September 2024

अलेप्पी Back Waters : कुदरत की रोमांचकारी दुनिया

            
         यह केरल का अलेप्पी है। बैक वाटर्स का सुरम्य संसार। नदियों, झीलों और समुद्र का संगम। नहरों का नेटवर्क। हर तरफ मीलोंतक पानी ही पानी। कहीं ठहरा हुआ पानी तो कहीं हलचल ही हलचल। पल-पल प्रकृति का रहस्य और रोमांच। खुला नीला आसमान और ठंडी-ठंडी हवा। परिंदों और जलीय जीवों का मधुर गान। पानी के बीचों-बीच हर-भरे द्वीप। सुकून का अद्वितीय अनुभव। नारियल के सुंदर बाग। ताड़ के बड़े-बडे़ पेड़। द्वीपों के किनारे तैरती छोटी-बड़ी मछलियां। पानी में हाउसबोट की जलीय दुनिया। किनारों पर बसे छोटे-छोटे गांव। जल-जीवन की यह एक ऐसी दुनिया थी, जो मेरे मन में समाती चली जा रही थी। बैक वाटर के रोमांच ने मुझे सम्मोहित कर लिया था। मैं निशब्द था। पर, धरती की गोद में प्रकृति के अभिनय से अभिभूत। सोचता हूं कि हम इस दुनिया के बारे में जानते ही कितना हैं? शायद एक परमाणु के बराबर भी नहीं। रहस्यों के संसार में हम खुद ही एक रहस्य से नजर आते हैं। 

 अलपुझा का बदलता मौसम

        आज सुबह (08 जुलाई 2024) ही जन शताब्दी से मैं अर्नाकुलम से अलेप्पी (अलपुझा) पहुंचा था। अर्नाकुलम से अलपुझा की दूरी करीब 50 किलोमीटर है। यहां डच हाउस में रुकने की व्यवस्था थी। यह रेलवे स्टेशन से लगभग तीन किलोमीटर दूर है। डच हाउस,  उस दौर की याद दिलाता है जब मालाबार में डच और पुर्तगालियों का साम्राज्य था। यहां के केयरटेकर ने अच्छी व्यवस्था की हुई थी। पूरे परिसर में कहीं भी बैठने, पढ़ने या समय बिताने की पूरी आजादी थी। यहाँ एक समृद्ध लाइब्रेरी थी। मैं कुछ देर रुका और फिर अलपुझा शहर की ओर निकल पड़ा पैदल ही। मूसलाधार बारिश ने मौसम का मिजाज ही बदल दिया। जब मैं आया था, तब तेज धूप खिली हुई थी। उमस थी। बारिश के साथ ठंडी बयार ने सब सुहावना कर दिया। मानसून में यहां ऐसा ही होता रहता है। कुछ देर में हम शहर में थे-आर्य होटल पर। लंच यहीं पर था। केरल की पारंपरिक शैली और बेहतरीन मसालों से बना दिलखुश भोजन। बारिश हल्की हो गई थी। यहां से मुझे बैक वाटर की ओर जाना था। यह करीब तीन किलोमीटर दूर था। हम अलपुझा के मेन मार्केट से होकर निकले। अलपुझा एक छोटा और पुराना शहर है। मॉडर्न लाइफ यहाँ कम ही दिखती है। सड़कें अच्छी हैं। ट्रैफिक व्यवस्थित है। लोग सीधे-सच्चे हैं। मददगार हैं। सही से गाइड करते हैं। शोरूम हैं, पर बहुत ज्यादा बड़े नहीं।




अभिभूत कर देने वाला रोमांचकारी सफर

       दोपहर करीब दो बजे थे। बूंदा-बांदी हो रही थी। हम बैक वाटर के स्टार्टिंग प्वाइंट पर पहुंच गए थे। यहां हमारी मुलाकात बशीर से हुई। यह लग्जरी हाउस बोट और शिकारा, दोनों को मैनेज करते हैं। मुझे शिकारा से बैक वाटर का सफर करना था। करीब चार घंटे के लिए। और, हमारा पानी पर सफर शुरू हो गया। नहरों के बीच से होते हुए हम ठहरे पानी के ऐसे विशाल क्षेत्र में पहुंच गए, जहां पानी पैर तैरती लग्जरी हाउस बोट, स्टीमर और छोटी-छोटी नावें हर तरफ आती-जाती नजर आ रही थीं। एक से बढ़कर एक हाउस बोट। यहां मुझे श्रीनगर की डलझील में हाउस बोट में बिताए समय की भी याद आई। वहां हमने दो दिन गुजारे थे। उसकी तुलना में अलेप्पी में हाउस बोट का सफर बिल्कुल अलग है। वहां झील के चारों ओर पहाड़ नजर आते हैं और चारों ओर हरियाली ही हरियाली। रसीले हरे रंग के धान के खेतों, सुडौल चावल के बजरों और किनारे पर बसे ग्रामीण जीवन को निहारना मेरे सबसे मंत्रमुग्ध करने वाले सुंदर अनुभवों में से एक था। यहां मानसून ने प्रकृति को रहस्य और रोमांच से भर दिया था।



नदी, झील और सागर का मिलन

        प्रकृति के सुरम्य संसार के बीच हम अपने चारों ओर पानी पर तैरती नावें देख रहे थे। ऊपर आसमान रंग बदल रहा था। हमारी नाव चला रहा विश्वनाथन ही हमारा गाइड था, जो अब एक दोस्त बन गया था। नाव एक छोर पर वह था और दूसरे छोर पर हम। नाव में बैठ कर सफर करने में मेरी दिलचस्पी कम थी। नाव के छोर पर खड़े होकर सफर करना काफी जोखिम भरा होता है। पर, रोमांच भी इसी में है। विश्वनाथन ने हम himmt और हौसला दे रखा था। गहरे पानी में जब नाव हिचकोले ले रही थी, तब जरूर सिहरन पैदा हुई थी। यह वह जगह थी, जहाँ नदी, झील और सागर का मिलन हो रहा होता  है। मेरी यादों की डायरी में आज के ये खुशनुमा रोमांचकारी पल दर्ज हो रहे थे। और, उस वक्त मुझे पंडित जयशंकर प्रसाद की अमर कृति “कामायनी” का स्मरण हो आया था। जीवन की उत्पत्ति के संदर्भ में यह एक अनुपम काव्य है। मनु, श्रद्धा और इड़ा के बीच संवाद के जरिये पंडित जी मनुष्य की कहानी कहते नज़र आते हैं। वह लिखते हैं-


कौन तुम! संसृति-जलनिधि तीर

तरंगों से फेंकी मणि एक,

कर रहे निर्जन का चुपचाप

प्रभा की धारा से अभिषेक!

 

मधुर विश्रांत और एकांत

जगत का सुलझा हुआ रहस्य,

एक करुणामय सुंदर मौन

और चंचल मन का आलस्य!”

 

एक झिटका-सा लगा सहर्ष,

निरखने लगे लुटे-से, कौन

गा रहा यह सुंदर संगीत?

कुतूहल रह न सका फिर मौन!

 

और देखा वह सुंदर दृश्य

नयन का इंद्रजाल अभिराम;

कुसुम-वैभव में लता समान

चंद्रिका से लिपटा घन श्याम।

         साहित्य का संसार ही ऐसा है जो हमें अनेक अर्थों में खुद से जोड़ता है। गीत-कविताओं को गुनगुनाते हुए हम अब जलीय किनारे पर एक छोटे से रेस्टोरेंट में थे। पानी पर लंबे सफर के बाद चाय-स्नैक्स के लिए यह एक अच्छी जगह थी। यहीं पर एक केरलवासी अपना बाज लेकर आ गया था। उसने पहले उसे हमारे कंधे पर बैठाया और फिर हमारे हाथ पर। परिंदे से दोस्ती के रूप में हमारी यह पहली मुलाकात थी। 


जंगलों और गांवों से गुजरती नाव

            हम यहां से बैक वाटर के पास गांवों की तरफ चल पड़े थे। महिलाएं और बच्चे अपने-अपने शिकारे (नाव) के साथ काम पर निकले हुए थे। कुछ जगहों पर एक पार से दूसरे पार जाने के लिए छोटे खूबसूरत पुल भी बने हुए थे। यह कुछ-कुछ इटली के वेनिस शहर जैसा नजारा था। वेनिस समृद्ध है लेकिन यहां समृद्धि के लिए कठोर संघर्ष है। काफी कुछ यहां होना बाकी है।  हमारी नाव गांवों से घने जंगलों की ओर बढ़ रही थी। गहरी शांति के आवेश मे हम लिपटे हुए थे। सच, यह मेरे सपनों का एक चमत्कारिक संसार था। मेरी अंतरात्मा आह्लादित थी। आज हम इस नियम के साक्षी थे कि हम जिसके साथ शिद्दत से जुड़ते हैं, हम वैसे ही हो जाते हैं। हमारा पर्यावरण, हमारा आस - पास हमें अपने जैसा बना ही देता है। जीवन के हर दौर में पहले हमारा आस -पास बदलता है, फिर हमारा जीवन बदलता है। एक खुशहाल जीवन खुशियों की दस्तक दे जाता है। और, उदासी व निराशा से भरा जीवन हमारे खुशहाल भरे जीवन में भी हताशा के पद चिन्ह छोड़ जाता है। कई मायनों में मेरे लिएअलेप्पी के अविस्मरणीय का सफर को शब्दों में बयां कर पाना बहुत मुशि्कल है। क्योंकि, यह एक अनुभव है। बहरहाल, अलेप्पी बैकवाटर्स शांति और रोमांच की तलाश करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए एक अविस्मरणीय जगह है। ज़रूर जाना चाहिए। हर कोई यहां के शांत जलमार्ग और हरी-भरी हरियाली को देखकर तरोताजा हो सकता है। चाहे आप अकेले यात्रा कर निकले हों या परिवार या फिर अपने प्रियतम के साथ अलेप्पी बैकवाटर्स सभी के लिए कुछ न कुछ प्रदान जरूर करता है।



ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

        अलेप्पी के बैकवाटर सदियों से केरल के इतिहास और संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इन जलमार्गों का ऐतिहासिक रूप से व्यापार और परिवहन के लिए उपयोग किया जाता था, जो दूरदराज के गांवों और कस्बों को जोड़ते थे। पारंपरिक हाउसबोट, जो मूल रूप से चावल और मसालों के परिवहन के लिए उपयोग किए जाते थे। अब ये शानदार फ़्लोटिंग होटलों में बदल दिए गए हैं।


सांस्कृतिक महत्व

        बैकवाटर केरल की संस्कृति और परंपराओं के साथ गहराई से जुड़े हुए हैं। स्थानीय समुदायों ने इन जलमार्गों के इर्द-गिर्द केंद्रित एक अनूठी जीवन शैली विकसित की है। ओणम के त्यौहार के दौरान आयोजित होने वाली वार्षिक स्नेक बोट रेस बैकवाटर के सांस्कृतिक महत्व का प्रमाण है। ये दौड़ न केवल स्थानीय लोगों की प्रतिस्पर्धी भावना को प्रदर्शित करती हैं, बल्कि उनकी विरासत से उनके गहरे जुड़ाव को भी दर्शाती हैं।


पर्यावरणीय महत्व

        बैकवाटर एक अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र बनाते हैं जो वनस्पतियों और जीवों की विविध श्रेणी की मदद करता है। आर्द्रभूमि और मैंग्रोव वन क्षेत्र के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये बैकवाटर कई प्रकार की मछलियों और पक्षियों के लिए भी महत्वपूर्ण आवास हैं, जिनमें प्रतिवर्ष इस क्षेत्र में आने वाली प्रवासी प्रजातियां भी शामिल हैं।




फैक्ट फाइल 

****     केरल बैकवाटर दक्षिण-पश्चिमी भारत में मालाबार तट के अरब सागर के समानांतर स्थित खारे लैगून और नहरों का एक नेटवर्क है। इसमें परस्पर जुड़ी झीलें, नदियाँ और इनलेट भी शामिल हैं, जो 900 किमी से अधिक जलमार्गों द्वारा निर्मित एक भूलभुलैया प्रणाली है। कभी-कभी इसकी तुलना खाड़ी से की जाती है।

****    नेटवर्क में पाँच बड़ी झीलें शामिल हैं, जो नहरों से जुड़ी हैं। ये  मानव निर्मित और प्राकृतिक दोनों हैं, जो 38 नदियों द्वारा पोषित हैं। ये केरल राज्य की लगभग आधी लंबाई में फैली हुई हैं। बैकवाटर का निर्माण तरंगों और तटीय धाराओं की क्रिया द्वारा हुआ था, जो पश्चिमी घाट श्रृंखला से नीचे बहने वाली कई नदियों के मुहाने पर कम अवरोध वाले द्वीप बनाते हैं। इस परिदृश्य के बीच में कई कस्बे और शहर हैं, शेष 7 अंतर्देशीय नौवहन मार्ग हैं।

****    बैकवाटर्स में एक अनूठा पारिस्थितिकी तंत्र है। नदियों का मीठा पानी अरब सागर के समुद्री जल से मिलता है। थन्नीरमुक्कोम के पास एक बैराज बनाया गया है। यह समुद्र से खारे पानी को गहरे अंदर जाने से रोकता है, जिससे नदियों का ताजा पानी बरकरार रहता है। इस तरह के ताजे पानी का बड़े पैमाने पर सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है[

****   केकड़ों, मेंढकों और मडस्किपर्स सहित जलीय जीवन की कई अनूठी प्रजातियाँ, टर्न, किंगफिशर, डार्टर और कॉर्मोरेंट जैसे जल पक्षी और ऊदबिलाव और कछुए जैसे जानवर बैकवाटर्स में और उसके आस-पास रहते हैं। ताड़ के पेड़, पैंडनस झाड़ियाँ, विभिन्न पत्तेदार पौधे और झाड़ियाँ बैकवाटर्स के साथ उगती हैं, जो आसपास के परिदृश्य को हरा रंग प्रदान करती हैं।

****    कोल्लम से कोट्टाप्पुरम तक राष्ट्रीय जलमार्ग  127 मील की दूरी तय करता है। यह  दक्षिणी केरल के समुद्र तट के लगभग समानांतर है, जिससे माल की आवाजाही और बैकवाटर पर्यटन दोनों को सुविधा मिलती है। वेम्बनाड झीलों में सबसे बड़ी है, जो 2,033वर्ग  किमी के क्षेत्र को कवर करती है। झील में नहरों का एक बड़ा नेटवर्क है जो कुट्टनाड के क्षेत्र से होकर गुजरता है। 

****    उत्तर से दक्षिण तक महत्वपूर्ण नदियाँ हैं वलपट्टनम 110 किमी , चालियार 169 किमी, कदलुंडीपुझा 130 किमी , भरतप्पुझा 209 किमी , चालकुडी 130 किमी , पेरियार 244 किमी , पंबा 176 किमी , अचनकोविल 128 किमी , मीनाचिल 75 किमी और कल्लदयार 121 किमी । इनके अलावा, घाटों से नीचे की ओर 35 और छोटी नदियाँ और नाले बहते हैं। इनमें से अधिकांश नदियाँ देश के मध्य क्षेत्र तक नौगम्य हैं।

****    वेम्बनाड झील केरल की सबसे लंबी बैकवाटर है,। साथ ही भारत की सबसे लंबी झील भी है। कोच्चि शहर, कुट्टनाड, कुमारकोम और पथिरमनल द्वीप इस लंबे बैकवाटर में स्थित हैं। वेल्लयानी झील, पूकोडे झील और सस्थामकोट्टा झील केरल की मीठे पानी की झीलें हैं। सस्थामकोट्टा उनमें से सबसे बड़ी है। केरल बैकवाटर्स दुनिया के तीन रामसर कन्वेंशन-सूचीबद्ध वेटलैंड्स की मेजबानी करते हैं:। अष्टमुडी झील, सस्थामकोट्टा झील और वेम्बनाड-कोल वेटलैंड्स को अंतरराष्ट्रीय महत्व के वेटलैंड्स के रूप में जाना जाता है।

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