कोच्चि में आज मेरा तीसरा दिन था। सुबह बादल छाए हुए थे। मौसम में ठंडक थी। हम तड़के ही कोच्चि की सड़कों पर निकल पड़े थे। हरा-भरा वातावरण। अरब सागर से आते हवा के ठंडे ठंडे झोंके। ताजगी से भरी सुबह। आस्थावान समाज के लिए पूजा-प्रार्थना का वक्त। मदमाती प्रकृति में एक आनंदोत्सव। यह सब आज का दिन आह्लाद से भरा रहने के संकेत दे रहे थे। हमने अपने भ्रमण की शुरुआत की-सांता क्रूज कैथेड्रल बेसिलिका चर्च से। यह फोर्ट कोच्चि में ही स्थित है। इसे कोटा पल्ली या कोटेपल्ली के नाम से भी जाना जाता है। चर्च की इमारत इंडो-यूरोपियन और गोथिक स्थापत्य शैली में बनी है। हम जब चर्च में पहुंचे, तब प्रार्थना सभा का समय था। अद्भुत शांति थी यहां। प्रभु जीसस के वचन दोहराए जा रहे थे। चर्च के दाएं भाग में मां मरियम की खूबसूरत मूर्ति लगी है। यह परिसर एक मंदिर का एहसास कराता है। प्रार्थना सभा में जाने से पहले लोग मां मरियम के आगे प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना मलयालम में होती है।
आने वाले कल की चिंता क्यों ?
मां मरियम के सामने मेरी आंखें सहसा ही बंद हो गई थीं। मन बहुत शांत था। प्रभु यीशु के विचारों के जरिए मैं अपने आप से बात कर रहा था। प्रभु कहते थे- “आने वाले कल के बारे में सोचकर कभी भी चिंतित मत होना, क्योंकि हर दिन की अपनी परेशानी होती है। और, वह परेशानी उसी दिन के साथ खत्म हो जाती है। एक-दूसरे की सेवा करना ही हमारा धर्म है। जो लोग दूसरों की मदद करते हैं, ईश्वर उन्हीं की मदद करते हैं। इसलिए, मन से स्वार्थ और लालच की भावना त्याग कर देना ही उचित है। प्यार बांटने के लिए पहले खुद से प्यार करना होता है। क्योंकि, प्यार से भरा मन ही प्यार बांटने में समर्थ हो पाता है।“ हम चर्च में करीब आधे घंटे रहे। चर्च का जब इतिहास जाना, तब इसकी की कहानी भी पता चली। यह केरल की एक ऐसी विरासत है, जो हमें 15वी शताब्दी में ले जाती है। 26 नवंबर 1500 का दिन। 13 जहाजों और 18 पादरियों के साथ पुर्तगाली बेड़ा यहां पहुंचा था। बेडे़ का नेतृत्व केएन पेड्रा अल्वारेस कैब्रल कर रहा था। उसने पहले कोच्चि (तत्कालीन कोहिम) के राजा उन्नी गोदा वर्मा तिरुमुलपाडु का भरोसा जीता। फिर पुर्तगाली मिशनिरयों ने पुर्तगाल मिशन की स्थापना की। यहां पुर्तगाली साम्राज्य की नींव रखे जाने के बाद 03 मई 1505 को यह चर्च बना। इसे 1558 में पोप पॉल IV द्वारा दर्जा बढ़ाकर कैथेड्रल घोषित कर दिया गया। 1984 में पोप जॉन पॉल II ने इसे बैसिलिका का दर्जा दे दिया।
सेंट फ्रांसिस चर्च और वास्को डि गामा की याद
कोच्चि की एक और विरासत है-सेंट फ्रांसिस चर्च। यह भारत का सबसे पुराना यूरोपीय चर्च है। यह 1503 में बना था। भारतीय उपमहाद्वीप में यूरोपीय औपनिवेशिक महत्वाकांक्षाओं के गवाह के रूप में इसका ऐतिहासिक महत्व है। पुर्तगाली खोजकर्ता वास्को डी गामा की मृत्यु 1524 में कोच्चि में हुई थी। उस वक़्त वह भारत की अपनी तीसरी यात्रा पर थे। उनके शरीर को मूल रूप से इसी चर्च में दफनाया गया था। उनकी कब्र के पत्थर अब भी यहां मौजूद हैं। वास्को डि गामा की मृत्यु के करीब चौदह साल बाद 1539 में उनके अवशेषों को लिस्बन ले जाया गया, वहां जेरोनिमोस मठ में इन्हें दफनाया गया।
कोचीन क्लब : अतीत की भव्यता की झलक
सेंट फ्रांसिस चर्च के सामने और एक खूबसूरत बगीचे में स्थित है-कोचीन क्लब। शांत और मनमोहक उपवन। क्लब की संरचना में विंटेज फ्लेवर। ऊंची छतें और मेहराबदार खिड़कियाँ। यह यहां के अतीत की भव्यता की झलक प्रदान करती हैं। आज यह क्लब खेल गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया है। यह क्लब 19वीं सदीं की शुरुआत में बना था। उस वक्त इसे इंग्लिश क्लब के नाम से जाना जाता था। यह कोच्चि में रहने वाले ब्रिटिश लोगों की जीवन शैली को दर्शाता था। ब्रिटिशों के अलावा कोचीन के कुलीन वर्ग के लोग इसके सदस्य होते थे। यहां बड़ी सभाएं होती थीं। कोच्चि के वाणिज्यिक इतिहास में शामिल कई लोग जैसे पियर्स लेस्ली और एस्पिनवॉल जैसी कंपनियों के उच्च पदस्थ अधिकारी इसके सदस्य थे। क्लब अभी भी अपने पुराने ब्रिटिश सदस्यों का रिकॉर्ड रखता है। क्लब का अपना एक भव्य और सुंदर पुस्तकालय है। अतीत की खेल ट्राफियों के अलावा यहां कई आकर्षण मौजूद हैं । क्लब में रहने और खाने-पीने की सुविधा है। लेकिन, क्लब परिसर में शराब पूरी तरह से प्रतिबंधित है।
ठाकुर हाउस और डेविड हाल
चर्च रोड पर पैदल भ्रमण करते हुए हम कोच्चि की एक विरासत से दूसरी विरासत तक पहुंच रहे थे। अब हम ठाकुर हाउस के सामने थे। यह उपनिवेशी काल के कांक्रीट निर्माण का अनुपम उदाहरण है। यह भवन सचमुच बहुत सुंदर है। इसे पहले कुनाल या हिल बंगलो के रूप में जाना जाता था। अंग्रेजों के शासनकाल में यहां नेशनल बैंक ऑफ इंडिया के मैनेजर रहा करते थे। आज, यह बंगला प्रसिद्ध चाय व्यापार फर्म राम बहादुर ठाकुर एंड कंपनी का है। थोड़ा आगे बढ़ते ही एक अन्य औपनिवेशिक संरचना देखने को मिली। यह है-डेविड हॉल। इसका निर्माण 1695 के आस-पास डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने कराया था। इस हॉल का मूल संबंध प्रसिद्ध डच कमांडर हेनरिक एड्रियन वान रीड ड्रैकेस्टन से था। केरल की प्राकृतिक वनस्पतियों पर लिखी गई उनकी किताब है- “होर्टस मलाबैरिकस “। इसी किताब से उन्हें ख्याति मिली।
बैस्टियन बंगला : डच वास्तुकला की प्रभावशाली इमारत
रिवर रोड पर एक अन्य शानदार दुर्ग नजर आता है। यहां बैस्टियन बंगला है। इंडो-यूरोपियन स्टाइल की अद्भुत संरचना। डच वास्तुकला की इस पर प्रभावशाली छाप है। मूल किले की दीवार में निर्मित, इसमें लंबे, खुले बरामदे और ज्यामितीय पैटर्न में टाइल वाली छत है। निर्माण के लिए मुख्य रूप से ईंट, लेटराइट और लकड़ी का उपयोग किया गया है। पहली मंजिल का बरामदा पूरी तरह से लकड़ी से बना है। ऐसा कहा जाता है कि बंगले के नीचे गुप्त सुरंगों का एक नेटवर्क है, लेकिन अभी तक कुछ भी नहीं मिला है। इतिहास की दृष्टि से पुर्तगालियों ने 16वीं शताब्दी के शुरुआती दशकों में फोर्ट इमैनुअल का निर्माण किया था। जब डचों ने 1663 में कोच्चि पर कब्ज़ा किया, तो उन्होंने किले को नष्ट करना शुरू कर दिया और इसे लगभग एक तिहाई आकार में छोटा कर दिया। मूल रूप से, किले में सात बुर्ज थे। इनमें से, स्टॉर्मबर्ग बुर्ज को बाद में बैस्टियन बंगला में बदल दिया गया। यह इमारत सन 1667 में बनकर तैयार हुई थी। इसका नाम पुराने डच किले के स्ट्रॉम्बर्ग बास्टियन के स्थान के नाम पर पड़ा है। अब राज्य पुरातत्व विभाग ने इमारत को संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया है।
फोर्ट इमैन्युअल : पुर्तगालियों, डचों के साम्राज्य का प्रतीक
अब हम के.जे. हर्शल रोड पर पहुंच गए थे। यहां से बाएँ मुड़ते ही फोर्ट इमैन्युअल की झलक देखने को मिलती है। यह फोर्ट कभी पुर्तगालियों के अधिकार में था। यह उस रणनीतिक सहयोग का प्रतीक है जो कोचीन के महाराजा और पुर्तकाल के राजतंत्र के बीच किया गया था। सितंबर 1503 में, कोच्चि के राजा ने अफोंसो डी अल्बुकर्क को अरब सागर के तट के पास फोर्ट इमैनुअल बनाने की अनुमति दी। निर्माण 26 सितंबर को शुरू हुआ था, और "इसने एक वर्ग का आकार लिया, जिसके कोनों पर आयुध से लदे बुर्ज थे"। दीवारें नारियल के पेड़ के तनों की दोहरी पंक्तियों से बनी थीं, जो एक-दूसरे से मजबूती से जुड़ी हुई थीं और बीच में मिट्टी भरी हुई थी; इसे एक गीली खाई द्वारा और भी सुरक्षित किया गया था। 1 अक्टूबर 1503 की सुबह पुर्तगाल के राजा के नाम पर किले का नाम "इमैनुअल" रखा गया। किला कोच्चि मुख्य भूमि के दक्षिण-पश्चिम की ओर जल-बद्ध क्षेत्र में बनाया गया था। किलेबंदी को 1538 में सुदृढ़ किया गया था। पुर्तगालियों ने सेंट फ्रांसिस चर्च सहित किले के पीछे अपनी बस्तियाँ बनाईं। फोर्ट कोच्चि 1663 तक पुर्तगालियों के कब्जे में रहा, जब डचों ने इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और पुर्तगाली संस्थानों को नष्ट कर दिया। डचों ने 1795 तक किले को अपने कब्जे में रखा, फिर अंग्रेजों ने डचों को हराकर इस पर कब्ज़ा कर लिया। 1806 तक डचों और बाद में अंग्रेजों ने किले की ज़्यादातर दीवारों और इसके बुर्जों को नष्ट कर दिया था। पुराने कोच्चि में और फोर्ट कोच्चि समुद्र तट के किनारे, आंशिक रूप से बहाल की गई बंदूक बैटरी और प्राचीर और किलेबंदी के अन्य अवशेष हैं, जो अब पर्यटन स्थल हैं। थोड़ा आगे चलने पर, डच कब्रिस्तान नजर आ रहा था। यहाँ की कब्रों के पत्थर उन यूरोपीय यात्रियों की चुपचाप याद दिलाते हैं, जिन्होंने अपने शासन को बढ़ाने के लिए अपनी मातृभूमि छोड़ दी थी।
वास्को डि गामा स्कावयर और पियर्स लेसले बंगला
चर्च रोड से थोडी सी दूरी पर है-वास्को-डि-गामा स्क्वेयर । यह संकरी सी टहलने की जगह है। थकान दूर करने के लिए यह अच्छी जगह है। यहाँ के स्टॉल अच्छे हैं। सीफुड, नारियल पानी और केरल के परंपरागत व्यंजन यहां काफी कुछ मिलता है। यहां से तरोताज़ा होने के बाद हम पियर्स लेसले बंगला पहुंचे। यह बंगला कभी पियर्स लेस्ली एंड कंपनी, पुराने ज़माने के कॉफ़ी व्यापारियों का दफ्तर हुआ करता था। इस इमारत पर पुर्तगाली, डच और स्थानीय लोगों का प्रभाव साफ झलकता है। इसके वाटरफ्रंट वरांडा मन को लुभाता है। दाईं ओर मुड़ने पर ओल्ड हार्बर हाउस है जिसे 1808 में बनाया गया था। इसके मालिक कैरिएट मोरन एंड कंपनी के प्रसिद्ध टी ब्रोकर हुआ करते थे। पास ही में कोडर हाउस है जो 1808 में कोचीन इलेक्ट्रिक कंपनी के सैम्युअल एस. कोडर द्वारा निर्मित एक भव्य इमारत है। यह इमारत उपनिवेशी समय से इंडो-यूरोपियन वास्तुशिल्प में बदलाव का अनुपम नमूना है।
सड़क के दोनों ओर यूरोपियन शैली के भवन
यहां से पुनः दायीं ओर मुड़कर प्रिसेस स्ट्रीट पहुंच गए। इस इलाके की प्राचीनतम सड़कों में से एक इस सड़क के दोनों ओर यूरोपियन शैली के भवन बने हैं। यहीं लोफर्स कॉर्नर अवस्थित है। यह कोच्चि के मौजमस्ती एवं क्रीड़ा पसंद लोगों के लिए एक पारंपरिक स्थल रहा है। बर्गर स्ट्रीट और डेल्टा स्टडी पर एक नजर डालते हुए हम फिर से प्रिंसेस स्ट्रीट और उसके बाद रोज स्ट्रीट पहुंच गए थे। डेल्टा स्टडी एक हेरिटेज बंगला है जिसका निर्माण 1808 में हुआ था। यह अब एक हाई स्कूल के रूप में बदल गया है। रोज स्ट्रीट पर वास्को हाउस स्थित है। माना जाता है यह वास्को डि गामा का आवास था। यह पारंपरिक और विशुद्ध यूरोपियन भवन कोच्चि के सबसे पुराने पुर्तगाली भवनों में से एक है।
ऐतिहासिक बिशप हाउस
पैदल घूमते-फिरते अब हम रिड्सडेल रोड पर पहुंच गए थे। यहां परेड ग्राउंड के सामने VOC गेट नजर आता है। इस गेट का निर्माण 1740 में हुआ था और इसका यह नाम इसपर अंकित डच ईस्ट इंडिया कंपनी के मोनोग्राम (VOC) के कारण पड़ा। इसके पास ही युनाइटेड क्लब है जो कभी कोच्चि के अंग्रेजों के चार एलीट क्लबों में से एक था। अब यह पास में स्थित सेंट फ्रांसिस प्राइमरी स्कूल की कक्षाएं चलती हैं। इसी सड़क पर सीधे चलते हुए हम बिशप हाउस पहुंच गए थे। इसका निर्माण 1506 में हुआ था। कभी यह पुर्तगाली गवर्नर का आवास हुआ करता था। यह परेड ग्राउंड के पास एक छोटी सी पहाड़ी पर स्थित है। भवन का फ्रंट भाग विशाल गोथिक मेहराबों से युक्त है । यह भवन डायोसीज ऑफ कोचीन के 27वें बिशप डॉम जोस गोम्स फेरेरिया के अधीन था, जिनका अधिकार क्षेत्र भारत के अतिरिक्त बर्मा, मलाया और सिलोन तक था।
और अंत में…
दिन ढल चुका था। मौमस करवट बदल रहा था। बारिश होने का एहसास होने लगा था। सड़कें सूनी होने लगी थीं। आज बहुत कुछ देखने को मिला था। अतीत और वर्तमान हमारे साथ था। जिंदगी की किताब में नए अध्याय जुड चुके थे। दिलो-दिमाग में कोच्चि से एक रिश्ता बन गया था। रात न होती, तो पैदल का सफर भी बंद होना मुश्किल था। शायद यह हमारे सपने ही होते हैं जिन्हें हम शिद्द से जीना चाहते हैं। और, आज मैं वही कर रहा था। आजादी के साथ घूमने का सपना। अपनी भौतिक और अंतर्यात्रा में खुद की तलाश। हम शुक्रगुजार हैं-उन सभी के, जो हमारे इस सफर में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग कर रहे थे । जीवन तो एक दरिया है। बहना ही इसकी नियति है।
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Kochi : A city of History and Heritage
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